69000 शिक्षक भर्ती | एक आम अभ्यार्थी की पीड़ा | जो की सिर्फ एक

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69000 शिक्षक भर्ती | एक आम अभ्यार्थी की पीड़ा |

यह कहानी नहीं एक असल ज़िंदगी के पहलु है जिससे उत्तर प्रदेश 410000 छात्र प्रभवित है | इस कहानी को आप तक पहुंचने उद्द्देश्य किसी की भावनाओ को ठेस पहुँचाना नहीं है |

नोट- कहानी मिले-जुले अनुभवों पर आधारित है। किसी की जिंदगी से पूरी समानता एक मात्र संयोग होगा।

ये दिन कोई दिसम्बर 2018 का रहा होगा।

लंबे संघर्ष के बाद ऐसा लगा था कि जैसे सब कुछ अपना होने ही वाला है। सब कुछ भले ही ना हो पर कुछ सपने तो पूरे होंगे ही। सर्दियों की धूप किसे प्यारी नहीं लगती?

छत पर बैठा कक्षा – 7 की इतिहास की किताब को पढ़ते – पढ़ते कब खिलजी से आसमान और उसमें पंखों को फैलाए चील को देखते – देखते खुली आंखों में सपने पिरोने लगा पता ही नहीं चला। घर से दोपहर के खाने की आवाज आई तो लगा कि किसी चील को नीचे उतरने का न्योता मिला हो।
जिंदगी के कई दिन उन्ही किताबों और आसमान के बीच बैठे गुजरे पता नहीं चला। किताबें बदलीं, सपने भी बढ़ते गए और धीरे – धीरे समय ने जैसे उस दिन को एकदम सामने ला पटका जिसका इंतजार लंबे समय से था।

सूरज निकलने को मानो तैयार नहीं था। बादलों में ऐसे छुपा जा रहा था जैसे मानो उसका भी पर्चा (paper) हो और अधूरी तैयारी में कैसे बाहर निकले? पर मैं तैयार था। वो आसमान, वो छत, वो चील, वो किताबें याद हैं ना? झूठ बोलता हूं तो उनसे भी पूछ लेना सब मेरी गवाही देंगी।

पर्चा दिया। ठीक – ठाक ही हुआ। बाहर आते – आते जैसे मन यही कहता हो की हां, अब दिल्ली दूर नहीं। लेकिन शायद यह नहीं पता था कि जिंदगी बस इसी दिन से पलटने वाली है।

अगला दिन आया साहब। पता चला पेपर को उत्तीर्ण करने के नंबर तय हुए हैं। झटपट दौड़ कर पेपर को दो – तीन बार मिलाया। जब पता चल गया कि पास होने वाले नंबर से बहुत आगे हैं तो जैसे लगा बस सब नजदीक ही है।

कहीं खबरें चलीं की 15 फरवरी तक सब बदल जाएगा। आज भी याद है, छोटा भाई बोला भैया अपने दोस्तों को भी बता दूं?

मैंने मना किया नहीं। अभी रुको। ये खबर नहीं है अभी।जब होगी तब बताना।

8 महीने बीत गए साहब इस सब को। खुशियां, वो दौड़ के पेपर मिलना, वो पिताजी को बताना। अब सब जैसे बोझ – सा लगता है।
ऐसा लगता है जैसे किसी फिल्म की शूटिंग में कोई किरदार था जो बहुत खुश था। कोई किरदार था, जिसकी जिंदगी बदलने वाली थी। पर अफसोस, फिल्म का हीरो वो किरदार नहीं था।जो हमेशा खुशियां ही देखता।

उस पर्चे (paper) में कुछ फेल हुए।कुछ कम नंबर ला पाए। कुछ यूट्यूब या अन्य स्रोत से मिली उत्तरकुंजी का गलत कोड भर आए।

वहीं कहते हैं ना। अपना दुख से अधिक दुख दूसरों के सुख पर होता है। वहीं हुआ।

झूठे न्याय के मसीहाओं ने जिंदगी जैसे रोक के रख दिया।

चंदा, राजनीति, फेसबुक के पन्ने, यूट्यूब के चैनल, वॉट्सएप के ग्रुप ने जैसे चारों तरफ से घेर लिया। दुकानें खुली गईं। छोटे से लेकर बड़े बड़े नेताओं की। कुछ भर्ती आगे बढ़ाने वाले तो कुछ प्रदेश के हर प्रशिक्षु को न्याय दिलाने वाले। कुछ छोटी तो कुछ बड़ी दुकान।

क्या बीटीसी, क्या बीएड,क्या शिक्षामित्र, क्या सरकार, क्या अधिकारी, क्या महाधिवक्ता….!

सच कहूं तो अब कोई अपना नहीं लगता और कोई पराया नहीं लगता।सब दोषी और सब निर्दोष नजर आते हैं। लगता है, जैसे सब एक खेल चल रहा है। हम सब उसके किरदार हैं।

ऐसे में इसके साथ जुड़ा चित्र बीमारू, विफल, अपंग, लाचार तंत्र को बखूबी बयां करता है।


धन्यवाद |

6 COMMENTS

  1. Sir apki ye khani bilkul muj pr fit baithti h isme thoda ad krna h Mera beta nine month ka tha tab me usko godi me lekar pdti thi theek see so bi ni pati thi ab vo sb yad krti hu to bahut Rona ata h

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